उत्तर प्रदेश के घने जंगल के एक कोने में एक कबूतर और एक कौआ....
कबूतर- क्यों कालिया... खबर सुनी तूने.. हमारे लिए देश की राजधानी के पास एक बहुत बड़ा शौचालय बनाया गया है... निहायत ही खूबसूरत और लाजवाब... करोड़ों की लागत से तैयार... शीशे की तरह चमचमाता हुआ... काश आज मेरा पेट खराब नहीं होता तो कल सुबह वहीं जाकर फेश होता...
कौआ- हंसते हुए... ऐसे भी क्या बेकरारी है... नोएडा हो या लखनऊ... बहनजी जो कुछ कर रही है हमारे लिए ही तो कर रही है... हमारी बुनयादी जरूरतों का कितना ख्याल रखती है... नोएडा और लखनऊ ही क्या... प्रदेश भर में नई चमचमाती मूर्तियां... भई रोज नए नए सिरों पर फ्रेश होने का मजा ही कुछ और है..
कबूतर- सही कह रहें हो दोस्त... हमारे सामने तो ऑपशन ही ऑपशन है... और एक हमारे बाप दादा का जमाना था... ले देकर वही धोती पहने, चशमा लगाए हाथ में लाठी लिए दुबले पतले आदमी की मूर्ती... सुबह शाम वहीं पर फ्रेश होना पड़ता था... हम तो हम इंसानों के वो जो नेता होते है ना... अऱे वहीं जो खादी के कुर्ते पाजामे और लाल बत्तियों वाली गाड़ी में घूमते है, वो भी उसकी अहिंसा, आजादी और सामाजिक बराबरी की बातों से इतना उकता गए है कि पत्थर की मूर्ती की तरह उसके विचारों को भी भूला दिया... हम उसकी मूर्ती के सिर पर बैठ पर गंदगी फैलाते है और वो दिल्ली में बने लोकतंत्र के मंदिर में बैठकर...
कौआ- भाई तुम्हारी बात से मुझे भी अपने दादा की बात याद आ गई... उन्हें नेहरू की गांधी टोपी बड़ी पसंद थी... कहते थे गांधी टोपी पर फ्रेश होने का मजा ही कुछ और है... वैसे नहरू का भी वही हाल हुआ जो गांधी का हुआ... उनके सपने के भारत में जगह जगह उनकी मूर्ती तो लगा दी गई लेकिन जैसे हम सबकुछ हजम करके सुबह मूर्ती पर निकाल देते है वैसे ही उसके विचारों को इस देश से निकाल दिया गया...
कबूतर- खैर छोड़ो हमे क्या लेना देना... भई हमे तो बस बहनजी से मतलब है... जिस मेहनत और लगन से वो हमारे लिए शौचालय बनाने में जुटी उसे देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब उत्तर प्रदेश के बाशिंदों के पास घर हो या न हो लेकिन हर परिंदे के पास अपना खुद का प्राईवेट शौचालय होगा... हर किसी के लिए एक मूर्ती... जैसे मन चाहे वैसे शौच करों...
चलिए जनाब ये तो इस कौए और कबूतर की बकवास थी... वैसे कुछ भी कहिए हम हिंदुस्तानी मूर्ती बनाने के मामले में कोई भेदभाव नहीं करते... हमारी पहली महिला प्रधानमंत्री की मूर्ती हर उस गांव और शहर में मौजूद है जहां पर औरते सबसे ज्यादा खस्ताहाल जिंदगी बसर कर रही हैं.... अपने आसपास भूखे और अशिक्षत बच्चों को खेलता देखकर भी नेहरू और राजीव की मूर्तियों के चेहरों पर बिखरी मुस्कराहट पर कोई फर्क नहीं पड़ता... शायद सरकार ने भी इन मूर्तियों को सोची समझी नीति के तहत ऐसी जगहों पर लगवाया जहां पर रहने वाले भूखे और गरीब लोग खुद को अकेला न महसूस करें... बदहाली में लोगों का साथ देने के लिए नेताओं, स्वतंत्रता सेनानियों, लेखकों और न जाने किस किसी की प्रतिमा... आजादी से लेकर अब तक मूर्तियां लगवाने के मामले में एक परिवार का बोलबाला रहा... लेकिन बहनजी के राज में अब वक्त आया है दलित उत्थान का...
क्या दलित उत्थान स्मारक बनवाने और जगह जगह अपनी और अपने माता पिता की मूर्तियां लगवाने से दलितों का सामाजिक सुधार हो रहा है... क्या वाकई सत्ता का फायदा उन लोगों तक पहुंच रहा है जो सदियों से हाशिये पर जी रहे है... क्या माया की इस माया से गरीबों और पिछड़ों को कोई फायदा हो रहा है... जी नहीं... पत्थर के इन बुतों और महलों को बनवाने के कमीशन से माया और उनके मंत्रियों की जेबें गर्म हो रही है और दलित आज भी पाषाण काल में जीने को मजबूर हैं.... पत्थर के बुतों का पाषाण काल...
तो भले आप बेरोजगारी की मार झेल रहे हों या प्रदेश में फैले गुंडा राज से पीड़ित हो... आपके दुखों को बांटने के लिए बहनजी हर जगह मौजूद है.... बाबूओं और वर्दी वालों की रिशवत से भरी जेबों पर भी बहनजी की पत्थर की नजर हमेशा रहेगी... तो अब न तो भूख से रोने की जरूरत है और न ही भ्रषाचार पर आंसू बहाने की... बलात्कार, गुंडा गर्दी, बेरोजगारी इस सबसे भी घबराने की कोई जरूरत नहीं है... क्योकि मायावती ने इन सबका इलाज तलाश लिया है... माया की मूर्ती थैरेपी..
देश का सबसे बड़ा प्रदेश भले ही उन्नति के मामले में पिछड़ जाए, भले बेरोजगारी नौजवानों को जुर्म की राह पर ढकेल दे... भले रोटी की तलाश में प्रदेश के लोगों को दूसरे प्रदेशो में जाकर पिटना पड़े... परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है... माया मेमसाहब की पत्थरीली आंखें सब देख रही हैं...
उत्तर प्रदेश का कुछ भी हाल हो मायावती अपने एजेंडे पर कायम है... प्रदेश की जनता जिए या मरे, प्रेरणा स्थल बनते रहेंगे... अंबेडकर और कांशीराम की विचारधारा को उनके ही पत्थर के बुतो के नीचे दफ्न करके मायावती सर्वजन सुखाए का नारा लगाती रहेंगी...
चलिए वापिस चलते है यूपी के उन्हीं घने जंगलों में... जंगल में हाथी की मदमस्त चाल में अब अजह ही रंगीनी है... हो भी क्यों ना... भई दिल्ली के पास आखिर किस जानवर का ऐसा रुतबा है... हाथी ने भी नोएडा के दलित पार्क के बारे में सुन लिया है... अपनी अकड़ में उसने सबको नजरअंदाज कर दिया... कौए और कबूतर को भी...
कबूतर ने कौए से कहा... घबरा मत दोस्त... एक दिन इसके सिर पर भी करेंगे...





